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डीपफेक पर लगाम: भारत के नए IT नियम कैसे बदलेंगे एआई से बनी सामग्री की दुनिया
फरवरी 2026 में लागू हुए संशोधित IT नियमों के तहत अब एआई से बनी सामग्री यानी डीपफेक को साफ तौर पर लेबल करना अनिवार्य है, और संवेदनशील सामग्री को कुछ ही घंटों में हटाना होगा।
एआई सामग्री पर भारत का नया कानून
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई से बनी सामग्री को लेकर भारत ने एक बड़ा नियामक कदम उठाया है। फरवरी 2026 में सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में संशोधन कर डीपफेक और एआई-जनित सामग्री पर सीधी निगरानी की व्यवस्था लागू कर दी है, जिसका असर करोड़ों उपयोगकर्ताओं पर पड़ेगा।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 10 फरवरी 2026 को ये संशोधन पेश किए, जो 20 फरवरी 2026 से प्रभावी हो गए। इनका मुख्य मकसद उस भ्रम को रोकना है जो असली और मशीन से बनी सामग्री के बीच का अंतर मिटने से पैदा होता है।
क्या है 'सिंथेटिकली जनरेटेड' सामग्री
इन नियमों के केंद्र में एक नई परिभाषा है जिसे सिंथेटिकली जनरेटेड इंफॉर्मेशन कहा गया है। यह ऐसी ऑडियो, दृश्य या ऑडियो-विजुअल सामग्री है जिसे कंप्यूटर के जरिए इस तरह बनाया या बदला गया हो कि वह असली जैसी और लगभग अप्रभेद्य दिखाई दे।
इसी श्रेणी में डीपफेक और अन्य एआई से गढ़ी गई सामग्री आती है, जो किसी वास्तविक व्यक्ति या घटना से हूबहू मिलती-जुलती लगती है। यही वह तकनीक है जिसका दुरुपयोग हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा चिंता का कारण बनकर उभरा है।
हालांकि नियम व्यावहारिक भी हैं। कैमरे के सामान्य फिल्टर, स्वचालित सुधार या सुलभता बढ़ाने वाले बदलाव जैसे रूटीन संपादन इसके दायरे से बाहर रखे गए हैं, ताकि आम उपयोगकर्ता बेवजह इन कड़े प्रावधानों की जद में न आ जाएं।
लेबलिंग और पारदर्शिता की शर्तें

नए नियमों की सबसे बड़ी शर्त पारदर्शिता है। अब प्लेटफॉर्म को उपयोगकर्ताओं से यह घोषणा करानी होगी कि उनकी सामग्री एआई से बनी है या नहीं, और यह जानकारी सामग्री प्रकाशित होने से पहले ही ली जानी अनिवार्य कर दी गई है।
जहां भी सिंथेटिक सामग्री प्रकाशित होगी, वहां प्लेटफॉर्म को उसे स्पष्ट और साफ दिखने वाले तरीके से लेबल करना होगा। इसका मकसद यह है कि दर्शक तुरंत पहचान सके कि सामने दिख रही चीज असली नहीं, बल्कि मशीन-निर्मित है।
इसके अलावा, जहां तकनीकी रूप से संभव हो, सामग्री के भीतर मेटाडेटा या उसके स्रोत की जानकारी जोड़नी होगी। इससे किसी भी सामग्री की उत्पत्ति का पता लगाया जा सकेगा और उसकी प्रामाणिकता की पुष्टि करना कहीं अधिक आसान हो जाएगा।
तेज़ी से हटाने की समयसीमा
नए ढांचे का दूसरा बड़ा पहलू सामग्री हटाने की समयसीमा है। खास तौर पर संवेदनशील मामलों में, जैसे बिना सहमति के बनाई गई अश्लील डीपफेक या किसी की झूठी पहचान गढ़ना, प्रतिक्रिया का समय बेहद कम कर दिया गया है।
पहले जहां ऐसी सामग्री हटाने के लिए चौबीस से छत्तीस घंटे तक का समय मिलता था, वहीं अब कुछ मामलों में यह घटकर महज कुछ घंटों का रह गया है। यह बदलाव पीड़ितों को यथासंभव तेज राहत देने की मंशा से लाया गया है।
यह सख्ती इसलिए भी अहम है क्योंकि डीपफेक से होने वाला नुकसान अक्सर कुछ ही घंटों में तेजी से फैल जाता है। ऐसे में जितनी जल्दी सामग्री हटेगी, उतना ही किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और निजता की बेहतर रक्षा हो सकेगी।
प्लेटफॉर्म और उपयोगकर्ता के लिए मायने
इन नियमों का पालन न करना प्लेटफॉर्म के लिए भारी पड़ सकता है। तय समयसीमा में कार्रवाई न करने पर उन्हें आईटी कानून के तहत मिलने वाली सुरक्षा यानी सेफ हार्बर का लाभ खोना पड़ सकता है, साथ ही दीवानी और आपराधिक जिम्मेदारी भी बन सकती है।
भारत जैसे विशाल डिजिटल बाजार के लिए यह संतुलन बनाना आसान नहीं है। एक ओर एआई नवाचार को बढ़ावा देना है, तो दूसरी ओर नागरिकों को गलत सूचना और पहचान की चोरी जैसे गंभीर खतरों से बचाना भी उतना ही जरूरी है।
आम उपयोगकर्ता के लिए यह बदलाव राहत भरा हो सकता है। जिस दौर में असली और नकली के बीच की रेखा लगातार धुंधली हो रही है, वहां अनिवार्य लेबल और तेज कार्रवाई भरोसे की उस डोर को फिर से मजबूत करने की एक कोशिश है।






