Rohan VermaVIEW PROFILE →
कृत्रिम बुद्धिमत्ता में आत्मनिर्भरता की ओर भारत: सस्ते जीपीयू और सार्वम के स्वदेशी मॉडल
भारत सरकार का महत्वाकांक्षी मिशन सस्ते जीपीयू और स्वदेशी भाषा मॉडल के ज़रिए देश को कृत्रिम बुद्धिमत्ता में आत्मनिर्भर बनाना चाहता है। सार्वम के नए मॉडल और भारी निवेश पर एक शांत नज़र।
तकनीक की दुनिया पर वर्षों से नज़र रखने के बाद मैंने बड़ी घोषणाओं को सावधानी से पढ़ना सीखा है। फिर भी 2026 में भारत जिस तरह कृत्रिम बुद्धिमत्ता में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है, उसे नज़रअंदाज़ करना कठिन है। यह किसी एक चमकदार उत्पाद की कहानी नहीं, बल्कि नींव तैयार करने की एक व्यवस्थित कोशिश है, और यही निरंतरता मुझे सबसे अधिक दिलचस्प लगती है।
इंडियाएआई मिशन की नींव
इसकी शुरुआत सरकारी संकल्प से होती है। मार्च 2024 में लगभग 10,372 करोड़ रुपये के बजट के साथ स्वीकृत इंडियाएआई मिशन सात स्तंभों पर टिका है, जिनमें कंप्यूट, बुनियादी मॉडल, डेटासेट, अनुप्रयोग, सुरक्षा, स्टार्टअप सहायता और कौशल शामिल हैं। इसे किसी भी विकासशील देश का सबसे बड़ा सरकारी निवेश माना जाता है, और शिखर सम्मेलन के बाद इसके दोगुना होने की चर्चा भी है।
सस्ते जीपीयू का बड़ा दांव
सबसे व्यावहारिक कदम कंप्यूट शक्ति से जुड़ा है। सरकार ने साझा पूल के तहत लगभग 34,000 जीपीयू तैनात किए हैं, जो स्टार्टअप, शोधकर्ताओं और सरकारी संस्थाओं को बेहद रियायती दरों पर उपलब्ध हैं। दिसंबर 2026 तक इस सार्वजनिक क्षमता को एक लाख जीपीयू तक ले जाने की योजना है। रिलायंस और टाटा जैसी निजी कंपनियों को जोड़ें तो कुल राष्ट्रीय क्षमता दो लाख के पार पहुँचने का अनुमान है।
सार्वम के स्वदेशी मॉडल
निजी क्षेत्र में सबसे चर्चित नाम सार्वम का है। अगस्त 2023 में स्थापित यह कंपनी भारत के पहले संप्रभु बुनियादी भाषा मॉडल के लिए सरकार की चुनी हुई साझेदार बनी। 18 फरवरी 2026 को इसने दो ओपन-सोर्स मॉडल पेश किए, सार्वम-30बी और सार्वम-105बी, जिनमें से बड़ा मॉडल प्रति टोकन लगभग 9 अरब पैरामीटर सक्रिय करता है और 1,28,000 टोकन तक का संदर्भ संभाल सकता है।
निवेश और वैश्विक ध्यान
पूँजी भी तेज़ी से आ रही है। मार्च 2026 में सार्वम एनवीडिया, एक्सेल और एचसीएलटेक की अगुवाई में लगभग 25 करोड़ डॉलर के दौर की बातचीत तक पहुँची, जिससे इसका मूल्यांकन 1.5 अरब डॉलर हो गया और यह यूनिकॉर्न बन गई। इससे पहले भी इसने बड़े निवेशकों से धन जुटाया था। फरवरी 2026 के शिखर सम्मेलन में तो 200 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धता जताई गई थी।
मेरी संतुलित राय
इतने उत्साह के बावजूद मैं संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता हूँ। बड़ी घोषणाएँ और भारी बजट अपने आप में सफलता की गारंटी नहीं देते, और असली परीक्षा ज़मीनी क्रियान्वयन में होती है। सरकारी जीपीयू आवंटन सीमित है, इसलिए कंपनियों को आगे अपनी राह खुद बनानी होगी। फिर भी नियमों, निवेश और स्वदेशी मॉडल को साथ जोड़ने की यह दिशा मुझे परिपक्व और व्यावहारिक लगती है।






