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एम्स से गाँव तक: भारत में स्वास्थ्य सेवा को बदल रहा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
22 एम्स परिसरों में एआई रिसर्च सेंटर, टीबी जाँच में 27% बेहतर नतीजे और ई-संजीवनी पर 28 करोड़ से अधिक परामर्श , 2026 में भारत की स्वास्थ्य सेवा एआई से नई करवट ले रही है।
भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल आईटी दफ़्तरों और स्टार्टअप्स तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की स्वास्थ्य सेवा की बुनियाद को गहराई से बदल रहा है। बड़े शहरों के अत्याधुनिक अस्पतालों से लेकर दूर-दराज़ के गाँवों तक, एआई धीरे-धीरे इलाज और जाँच का एक अहम हिस्सा बनता जा रहा है।
साल 2026 में इस बदलाव की दिशा भी बदल चुकी है। अब बहस इस बात पर नहीं है कि एआई काम करता है या नहीं, बल्कि इस पर है कि इसे स्पष्ट नियमों और सुरक्षा मानकों के साथ चिकित्सकीय प्रक्रियाओं में कैसे सुरक्षित रूप से शामिल किया जाए। यह परिपक्वता की ओर बढ़ता एक बड़ा कदम है।
एम्स में एआई अनुसंधान का जाल
इस क्रांति के केंद्र में देश के प्रतिष्ठित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स हैं। देश भर के 22 एम्स परिसरों में समर्पित एआई रिसर्च सेंटर रेडियोलॉजी, पैथोलॉजी और दवा खोज के लिए मशीन लर्निंग का इस्तेमाल कर रहे हैं और भारतीय मरीज़ों के आँकड़ों पर परखे गए मॉडल तैयार कर रहे हैं।
इसे और मज़बूती देने के लिए तीन संस्थानों को स्वास्थ्य सेवा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए उत्कृष्टता केंद्र यानी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का दर्जा दिया गया है। इनमें एम्स दिल्ली, पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ और एम्स ऋषिकेश शामिल हैं, जो एआई जाँच उपकरणों को मान्य करने का काम करेंगे।
इन केंद्रों की एक अहम ज़िम्मेदारी चिकित्सकों को प्रशिक्षित करना भी है। लक्ष्य यह है कि डॉक्टर एआई की मदद से बेहतर और तेज़ निर्णय ले सकें, जिससे तकनीक और मानवीय विशेषज्ञता एक-दूसरे की पूरक बनें, न कि एक-दूसरे की जगह लें।
टीबी के खिलाफ जंग में एआई

एआई का सबसे ठोस असर तपेदिक यानी टीबी के खिलाफ चल रही लड़ाई में देखने को मिला है, जो भारत के लिए एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती रही है। राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम में एआई आधारित उपकरण जोड़े जाने के बाद टीबी के प्रतिकूल नतीजों में 27 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
इससे भी दिलचस्प बात यह है कि संसाधनों की कमी वाले इलाकों में कुल टीबी पहचान में लगभग 15.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी अकेले एआई की वजह से मानी गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि एआई ने उन मामलों को भी पकड़ा जिन्हें रेडियोलॉजिस्ट संदिग्ध नहीं मान रहे थे।
यह क्षमता ग्रामीण और दूर-दराज़ के इलाकों के लिए बेहद मूल्यवान है, जहाँ विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। एक्स-रे की स्वचालित जाँच वहाँ शुरुआती पहचान को संभव बनाती है, जिससे बीमारी को गंभीर होने और फैलने से रोका जा सकता है।
गाँव-गाँव तक पहुँचता इलाज
स्वास्थ्य मंत्रालय ने रोग निगरानी, टेलीमेडिसिन और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण कार्यक्रमों में एआई उपकरणों को शामिल किया है। इसमें ई-संजीवनी टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म के साथ जुड़ी क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम और टीबी जाँच में मदद करने वाले एआई उपकरण प्रमुख हैं।
इस पहल का पैमाना बेहद विशाल है। अप्रैल 2023 से नवंबर 2025 के बीच एआई की मदद वाले ई-संजीवनी प्लेटफॉर्म के ज़रिए 28 करोड़ 20 लाख से अधिक परामर्श किए गए। यह आँकड़ा दिखाता है कि तकनीक किस तरह करोड़ों लोगों तक स्वास्थ्य सेवा पहुँचा रही है।
कैंसर की जाँच में भी एआई ने उल्लेखनीय भरोसा हासिल किया है। ज़िला अस्पतालों में तैनात एआई स्क्रीनिंग उपकरणों ने सर्वाइकल और स्तन कैंसर की जाँच में 90 प्रतिशत से अधिक की नैदानिक सटीकता हासिल की है, जो शुरुआती पहचान के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।
हालाँकि विशेषज्ञ सावधानी की भी सलाह देते हैं। एआई की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी ज़िम्मेदारी से लागू किया जाता है, मरीज़ों के आँकड़ों की गोपनीयता कैसे सुरक्षित रखी जाती है और यह मानवीय डॉक्टर की जगह लेने के बजाय उसकी मदद कैसे करता है।
कुल मिलाकर, भारत की स्वास्थ्य सेवा एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। यदि तकनीक, नीति और मानवीय विशेषज्ञता का सही संतुलन बना रहे, तो एआई देश के करोड़ों लोगों तक सस्ती, तेज़ और सटीक चिकित्सा पहुँचाने का सबसे शक्तिशाली माध्यम साबित हो सकता है।






